खुद के अंदर जो मैं गिरफ़्तार हूँ लोग कहते हैं कि मैं समझदार हूँ। मानी मेरे लफ्जों को ढूँढ लेते हैं ये न समझना कि मैं असरदार हूँ। मतले तक ही तो सफ़र है मेरा म्यान में फँसी हुई इक तलवार हूँ। गुजर जाते हैं वो इक नज़र देख गुज़रे हुए दिन का अखबार हूँ। कोई मतलब नहीं मेरे होने का फटी हुई कुर्ती का सलवार हूँ। किस्से बहुत हैं, बस किस्से ही हैं आखिरी मुगल का मैं दरबार हूँ। बेटा, भाई, पिता, क्या क्या नहीं अपने भीतर मैं पूरा परिवार हूँ।