कौन कहता है मैं गज़ल लिखता हूँ महज़ सूद का मारा असल लिखता हूँ। बहुत सस्ती बिकी जो खेतों की रौनक इक भूखे किसान की फ़सल लिखता हूँ। सिसकता सा बचपन, हँसते हुए बच्चे इक झोंपड़ी में बसता महल लिखता हूँ। न गलियों की यारी,न नुक्कड़ की बैठक सड़कों पे भटकता शहर लिखता हूँ। समय की कमी है, न आँखों में नमी है रिश्तों पे जो बरपा वो कहर लिखता हूँ। तुम तो रेत पे मकां बना कर चल दिए दिल पे जो छप गया,वो पल लिखता हूँ। तुम्हारा इंकार है ये मानता हूँ लेकिन गुजरेगा साथ ही जो वो कल लिखता हूँ।