जीवन इक नदी है रिश्ते बाँध की तरह घेर लेते हैं इसे भावनाएँ भरती जाती हैं थोड़ी थोड़ी निकलती जाती हैं इक दिन लेकिन ऐसा भी आता है ऊबकर टूटकर सब तोड़ ताड़ सैलाब बन बह जाती हैं लीलकर सारे रिश्तों को।