जिंदगी से खुलकर मिलने का वादा रह गया
तुम भी पूरे न हुए और मैं भी आधा रह गया।
मीरा बनी वो इश्क में, मैं बना रहा कबीर
वो रंगों में डूब गयी और मैं सादा रह गया।
बेफिक्री का वो आलम जब भी साथ होते थे
निकले बारिश या धूप में,घर में छाता रह गया।
यादों ने तो इस कदर पूरा अपना काम किया
रिश्ता कब्र में सो रहा,ज़ख्म ताज़ा रह गया।
बेमन से मिलने की इक जगह मुकर्रर हुई
वो भी आता रह गया,मैं भी जाता रह गया।