इस शहर में तो सारे ही हैं अब अंजान से कहाँ आती है रोशनी घर के रोशनदान से। मेजबान हुआ करते थे जो महफिल में जो मुफलिसी आयी तो हुए वो मेहमान से। जमीं तो तेरी थी,तू अपना न सका ऐ दोस्त फिर गिला क्यूँ बेवजह है तुझे आसमान है। तुझे लगता है जिंदगी बहुत मुश्किल है कभी मिल आओ सरहद पे खड़े जवान से। कुछ झूले, कुछ शरीफ़ से बच्चे ही रह गए खुशबू तो उड़ गयी है इस बागवान से।