मेहनत उतनी ही करता हूँ मैं पेट से जितना डरता हूँ। इक लम्हा जीने की खातिर कतरा कतरा मैं मरता हूँ। चेहरे पे तेरे लिख लिख कर हर रोज मैं खुद को पढ़ता हूँ। ख़्वाहिशों का इक पर्वत सा है नज़रों में गिर कर चढ़ता हूँ। मंजिल हासिल कर ली मैंने अब तो मारा मारा फिरता हूँ। उसके भीतर जो भर गया मैं आँखों से उसकी मैं बहता हूँ। कहने को तो इक मकां है मेरा उस टूटे मलबे में रहता हूँ।