हफ्ते में इक बार मिलना क्यूँ जुरुरी है ये तो इश्क है,थोड़े ही हफ्ता वसूली है। महज़ अश्क थे जो जाम में गिर गए इनका तासीर लेकिन बहुत अंगूरी है। क्या हुआ जो तुम्हारी तलाश जारी है कहाँ पता मृग को नाभि में कस्तूरी है। अपनी पहचान चलिये बना लेते हैं वर्ना तो जनाब ताउम्र जी हुजूरी है। हिन्दू मुस्लिम भाई हैं,चलो अच्छा है ये महज़ नारा है,जो अभी भी दूरी है।