आज रात ज़रा सा नींद पे मेहरबान था
आँखों में न तुम थी न ही आसमान था।
जिंदगी जाते जाते कुछ यूँ सुलझ गयी
जहाँ मेरी मौत हुई वहीं श्मशान था।
वक्त, जमीर, गैरत, रिश्ते सब बिक गए
जुरुरतों की भीड़ में वो परेशान था।
कपड़े पहनाता हूँ अपनी शक्ल को भी
सुकून था चेहरे पे,दिल में घमासान था।
खुदा का नूर था उस बच्चे की आँखों में
खुदा से वो बच्चा बिल्कुल अनजान था।