अब कहाँ छपती हैं ख़बरें
अब महज़ बिकती हैं ख़बरें।
जिसका बटुआ भारी उसकी
जेब में अब मिलती हैं ख़बरें।
कलमों की सत्ता है बदली
सियासतें लिखती हैं ख़बरें।
हर भेज़ा जो तंदूर हुआ
अब वहाँ सिंकती हैं ख़बरें।
मज़हब का चश्मा आँखों पे
बारूद सी दिखती हैं ख़बरें।
सुबह की अख़बार में अब
बहुत ही खलती हैं ख़बरें।


