आर्यवृत के इस रण में राधेय को मिला अब मौका है
मैं कर दू अन्त सब पांडव का किंतु वचनों ने रोका है
अब अर्जुन अंतिम लक्ष्य है मेरा ध्यान उसी पर धरना है
उसके साथ खड़े नारायण फिर भी तनिक ना मैं घबराऊँगा
आज समर भूमि में मैं वीभत्सु से टकराऊँगा
अपमान अवहेलना के ही शब्द जीवन पर्यन्त सुने मैने
वे थे तो केवल शब्द मगर घाव किये सबने पैने
हुँ सुतपुत्र सामर्थ्यहीन सुनकर ये जीवन बित गया
सामर्थ्य मेरा इस रण मे आज इन बाणो से दिखलाऊँगा
आज समर भूमि में मैं वीभत्सु से टकराऊँगा
परिणाम आज का ज्ञात मुझे ये युद्ध फिर भी लडना हैं
कर्तव्य पथ जो चुन लिया उस पर ही आगे बढना हैं
यदि श्राप के प्रभाव से मृत्यु भी हो जाए फिर भी
हरिमुख से मेरे कौशल कि प्रशंसा तो सुनकर जाऊंगा
आज समर भूमि में मैं वीभत्सु से टकराऊँगा.....


