अरे ओ इंसान....
कुदरत को हो नामंज़ूर ऐसा काम न कर...
अपनी हरकतों से इंसानी क़ौम को बदनाम न कर,
खुदा ने बक्शी इन अमानतों को तार तार सरेआम न कर।
कुदरत को हो नामंज़ूर ऐसा काम न कर...
जीने के इस ज़रिए को नालियों में बहा कर यूँ बर्बाद न कर,
सूखे का ये खौफनाक मंज़र अपनी पीढ़ियों के नाम न कर।
कुदरत को हो नामंज़ूर ऐसा काम न कर...
अपने मुनाफ़े के नाम पे जानवरों का शिकार न कर,
इन बेज़ुबानों को मार कर हैवानो जैसा व्यवहार न कर।
कुदरत को हो नामंज़ूर ऐसा काम न कर...
इन कारों कारखानों से हवा की तासीर खराब न कर,
अपने आराम के लालच में अपनी ही मौत का इन्तेज़ाम न कर।
कुदरत को हो नामंज़ूर ऐसा काम न कर...
गुंजाइश है अभी बाकी इन्हें बचाने की थोड़ी,
अपनी लालसा में अभी भी इन पर अत्याचार न कर।
कुदरत को हो नामंज़ूर ऐसा काम न कर...

