सुनो..
ये जो तुम्हारी मासूम अठखेलियां हैं
ये लम्हों को दास्तान बना देती हैं
मेरी उल्फत की अदनी सी कली को
मुहब्बत का गुलिस्तान बना देती हैं
क्यों हौले से मुस्कुरा कर दिल के तार छेड़ती हो
तुम्हारी कशिश ज़र्रे को दराज़ बना देती है
~नंदन
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