घर, जश्न, त्योहार मेंं

जो रौनक लाए

वो औरत है ।


दुख मेंं, मात में, 

बिगड़ते हुए हालात मेंं

जो साथ निभाए

वो औरत है ।


चौके, मंदिर और कमरे को

जो जगाए;

माहौल में नर्मी लाए

वो औरत है ।



सब कुछ सुन

हजम कर जाए,

हर हाल में मुस्कुराए

वो औरत है ।



दिल खोल सबको खिलाए

और

थोड़े मेंं खुद काम चलाए

वो औरत है ।



क्रोध में, दुत्कार पर,

थोड़े से दिलासे पर

जो आँसू बहाए

वो औरत है ।



मकान को जो

घर बनाए,

बाल-बच्चे करे,

अपने काम की आहुति लगाए

वो औरत है ।



साज करे, 

अनुष्ठान करे,

ब्याह और परिवार करे;

ज़लालत के बदले

न किसी का तिरस्कार करे;

क्या वही सिर्फ औरत है ...?



गौर फरमाइए,

शायद...

अब परिभाषा बदलने की ज़रूरत है!




- निहारिका मोहन