जलती चिता से जब बेटी की 

चीख़ गूंजी

“क्या मैं तेरी बेटी नहीं थी”

इंसाफ़ का दामन झूठा थामा

मुझे बचाना मुझे पढ़ना 

तेरा इलेक्शन का ये बहाना 


मेरा जिस्म राख बनाया 

वादा तूने ख़ाक निभाया

जन्म कोख़ से जिसके ली 

क्या वो मेरी जैसी नहीं थी 

“क्या मैं तेरी बेटी नहीं थी”


देर रात तूने आग जलाई 

मेरे जिस्म में रूह चिल्लाई

क्या मेरे माँ-बाप खड़े हैं 

देख ज़रा कहीं दूर पड़े थे 

समझाती कैसे दर्द हुआ हैं 

मुँह मेरा कटा हुआ हैं 

किससे बोलूँ कैसे बोलूँ 

अपना मुँह मैं कैसे खोलूँ


जलाना ही था तो अग्नि देते 

बाप के हाथ में लकड़ी देते 

चिता तूने क्यों जलाई 

फिर कैसे तुझको नींद आयी 


मेरे जिस्म को जिसने छिला 

इंसाफ़ का तराज़ू क्यों रहा ढीला

क्या वो इंसाफ़ की देवी नहीं थी 

“क्या मैं तेरी बेटी नहीं थी “