ह्रदय के धरातल पर
दुखों की मिट्टी से आच्छािदत,
अंतरतम की आश्रुधारा सिंचिंत होकर
फूटती है जो कोपल ,
वह होती है
एकदम निष्कलुष निष्पाप,निश्चल ,
आत्मा का दर्पण होती है कविता।
शनै: शनै: लहराती है जीवन में ,
मन्द बयार सी ,
वह होती है कविता। !
उसकी न क़ोई भाषा, नकोई वर्तनी,
न भाव न विचार,
जो स्वत: कलम से बहती है,
वह होती है कविता !