तोड़ लिया साख से मुझको
थी अभी केवल एक कली ही तो मैं,
तिनकों सी थी बनी मैं,
था ही क्या क़सूर मेरा,
कि थी इक लड़की मैं?
मसल दिया तुमने अपने इन गन्दे हाथों से,
दिखा दि सारी ताक़त अपने आदमी होने कि,
जो है छुपी तुम्हारी
असीमित क्रूरता, और कायरता में
तो मुबारक हो तुमने कर लिया,
फिर एक बार पता कि अभी भी हो एक क़ायम आदमी तुम,
एक लड़की के शरीर, आत्मा को झलनी करके,
उसकी पहचान, उसके वजूद को मिटा कर आज तुम पूरे आदमी बन गये,
मुबारक हो तुमने अपनी शक्ति, अपनी निर्दयता फिर से साबित कर दी एक कमज़ोर, असहाय के आगे
मुबारक हो,
आज तुम्हारे इस महान कृत से तुम्हारी वो माँ जिसने कभी सही थी असहनीय पीड़ा तुम्हें यहाँ लाने को रही है वो छुपा अपना चेहरा,
कोस रही है अपनी कोक और उस दिन को,
किस अद्भुत रूप में चुकाया है तुमने उसके प्रेम, उसकी उम्मीदों का एहसाऩ भी तो
सच में अद्भुत, अकल्पनीय है ख़ुद को प्रकृति कि सर्व श्रेष्ठ रचना बताने वाला ये आदमी,
पूर्ण रूप से खोखला, ख़ाली पर अंहकार कि न है इसमें कहीं कोई भी कमी़,
मुबारक हो,
फेंक दिया तुमने रौंद कर,
खा लिया नोच-नोच कर,
इक शरीर, इक आत्मा को,
मिला क्या ही तुम्हे इससे,
मिट गई भूख तुम्हारी, बुझ गई दहकती आग तुम्हारे इस घृणित जिस्म कि,
अब नहीं लगेगी फिर से कभी,
मिल गया उतना मुझ से जो तुम्हें तृप्त कर सके,
या फिर ढूंढ़ना पड़ेगा तुम्हें किसी और को इस आग को बुझाने के लिये,
और यदि सारा संसार ही कम पड़ जाये तुम्हारी इस भूख के आगे,
फिर मुड़ जाना, जलाने को स्वयं का घर,
और तब भी न मिटे भूख तुम्हारी ये वृह्द
तो ख़ुद को जला देना, झोंक देना इस आग में,
खुद़ को ही नोच-नोच कर खाना,
फिर होगी तृप्ति तुम्हारे पापों की इस ज्वलित भूख कि।


