सच झूठी दुनिया का,
ये भी क्या मजे़दार क़िस्सा है
जो दुनिया ही एक झूठ हो,
एक ख़्वाब सी क्षणिक हो,
उसमें क्या और कितना सच हो सकता है
सोचा है कभी,
नहीं तो सोचो ज़रा,
से सच क्या है
उसका सच जो उसने देखा, महसूस किया,
या मेरा सच जो है मैंने गढ़ा,
आख़िर इस सच का सच क्या है?
कौन करे ये बमुश्किल फ़ैसला,
कि यहाँ कुछ सच है भी या नहीं
और है तो क्या?