चल चूके अब तक लाखों मील, फिर भी मजबूर है ये दिल, कहने को, हाँ रास्ते में हैं अभी। जा रहें हैं कहाँ ?  कुछ पाना है,  अच्छा क्या? कुछ भी... पता नहीं पर कुछ तो होगा ही, चल रहें है तभी, हम तो रास्ते में हैं अभी। एक पल रोया है यहाँ, एक पल खोया है यहाँ, सुना था कभी बस एक पल का सफ़र है, एक पल तो छोड़ो, कई सदियाँ गुज़र गयी, मैं सुकून से सोया ही नहीं। क्यूँ ? क्योंकि रास्ते में हैं अभी... अच्छा हाँ याद आया। कब थमेगा ये सफ़र, कब रूकेगा ये क़दम, कब एक लम्बी आँह भरोगे करके इन आँखों को बन्द। कब जियोगे ये ज़िन्दगी... ज़िन्दगी ??? हाँ ज़िन्दगी। ये क्या है? हमने तो कभी जाना ही नहीं, क्यूँ? क्योंकि रास्ते में हैं अभी। अच्छा हाँ भूल जाता हूँ बार-बार अब याददाश्त कुछ कमज़ोर सी हो गयी, हाँ तो साहब ज़िन्दगी वो है जो आपको जिने के लिये मिली थी कभी, ख़ैर, आप तो रास्ते में हैं अभी। पहुँचियेगा जब कहीं किसी मन्जिल पर तो जी लिजियेगा, थोड़ी सी ज़िन्दगी, कहते हैं खुदा के ख़ूबसूरत तोहफ़े सी है, है कुछ फूलों की भिनी-भिनी महक सी, कभी दिल में उठती उस अजीब कसक सी, और कभी ठंडी हवा के झोंकों सी, बचपन में खेलते उस खो-खो सी, और कभी रात की चादर में छुपी चाँदनी सी, कुछ-कुछ रिमझिम बारिश सी, फिर है कभी ये ढलती शाम सी, और कभी ओठों पे बिखरी वो हल्की मुस्कान सी, तो कभी सुबह -सुबह पक्षीयों की चहचहाती आवाज़ सी, कुछ-कुछ अदरक की चाय, और आज के अख़बार सी, कहते हैं कुछ ऐसी सी है ये ज़िन्दगी, ख़ैर, आप तो रास्ते में हैं अभी।