“कई शिकवे से लगते सवाल हैं उसके,
जो अक्सर पूछ लेता है वो मुझ से...
एक ख़ूबसूरत सा एहसास हूँ
दूर हूँ फिर भी तेरे पास हूँ,
नहीं हूँ हिस्सा तेरी दुनिया का फिर भी तेरे लिये खाश हूँ,
क्यूँ हूँ?
साँस में हूँ तेरे हर ख़्वाब में हूँ,
पर नहीं हूँ तेरे एक भी अल्फ़ाज़ में।
फिर क्यूँ बयान करती है मुझे अपने आँसूओं में,
जब तेरा कुछ नहीं हूँ,
तेरी सिसकियों में तो सुनाई देता हूँ मैं पर तेरी लवों की हँसी में नहीं हूँ क्यूँ?
तेरे अतीत में तो हूँ, पर क्यूँ नहीं तेरे कल में हूँ,
तेरी आँखों में तो हूँ, पर तेरे हर पल में नहीं हूं क्यूँ?
तेरी शायरी में तो हूँ पर तेरी ज़ुबान पर नहीं हूँ,
तेरी मन्नतों में तो हूँ,
पर हूँ नहीं कही भी तेरे इकऱार में क्यूँ,
अभी तक हूँ तेरी यादों में, पर तेरी बातों में नहीं हूँ,
अभी तक तेरी ज़िन्दगी का एक हिस्सा ते हूँ पर तेरी ज़िन्दगी नहीं हूँ क्यूँ?