अब कुछ पाना नहीं चाहती, और खोने के लिये मुझ में कुछ शेष नहीं,
हँसना भी नहीं चाहती, और रोने के लिये कुछ खाश है नहीं,
आगे और कहीं चल कर भटकना नहीं चाहती,
पर ठहरने के लिये मंज़िल पर अभी पहुँची नहीं,
रौशनी में जाना नहीं चाहती और,
अन्धेरे से ज़्यादा गुफ़्तगू अभी हुई नहीं,
जिसकी जुस्तज़ू है उसे माँगना नहीं चाहती,
और किसी से मुख़्तलिफ़ होने के लिये मुझ में कुछ नहीं
इस दुनिया और यहाँ के लोगों से कुछ लेना नहीं चाहती,
और इन्हें देने के लिये मेरे पास भी कुछ है नहीं।