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अब कुछ पाना शेष नहीं

अब कुछ पाना नहीं चाहती, और खोने के लिये मुझ में कुछ शेष नहीं,
हँसना भी नहीं चाहती, और रोने के लिये कुछ खाश है नहीं,
आगे और कहीं चल कर भटकना नहीं चाहती,
पर ठहरने के लिये मंज़िल पर अभी पहुँची नहीं,
रौशनी में जाना नहीं चाहती और,
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