बेखुदी से दिल में आंधी मचल रही है,
न पूछो कि ज़िन्दगी कैसी चल रही है?
अब सभी तरह के स्वाद मिट जायेंगे,
खुशी मेरी जो दाल बन उबल रही है।
अनदेखा वो करते है छोटी बातों पर,
एक बार देखने से बात संभल रही है।
बेताबियों ने खा लिया अरमानों को,
मेरे ख्वाबों की सतह अब गल रही है।
कोई वज़ह भी नहीं अलविदा करने की,
हर बेकसूर को दुनिया निगल रही है।
आग ज़्यादा ही लगी है इस साल में,
चारों ओर सिर्फ़ ज़िंदगियां जल रही है।


