दिये की रौशनी में गाँव जगमगाता था,

बिजली की तो बात दूर लालटर्न भी कोई ना जलाता था।

छोटी सी उस गाँव में एक मैना रहती थी,

हर साँझ गाँव की गलियों में वो चहका करती थी,

हर घर अपना था हर द्वार अपना कहती थी,

बस्ती में बस्ता उठा संग संग घुमा करती थी,

पाठशाला की दुरी ठहाकों से पूरी कराती थी।

गाँव में खुशियाँ आनी थीं त्यौहार का जो दिन था,

रौशनी दुगनी थी गाँव की, हर तरफ आवाजें थीं।

दो पहर से बेटी घर को ना लौटी थी,

जगराता वाली रात को कैसा सन्नाटा मंदिर में,

कभी ना सुना ऐसा भयानक घटा था उस गाँव में।

दो दिन बाद भी मैना लौट कर ना आयी थी,

माँ हर दरवाजा हर चौराहा ढूंढ़ आयी थीं।

मैना मिली जिस हाल में गाँव चीख पड़ा..

ऐसी हैवानियत की शोर से सन्नाटा भी दहल गया।

उस माँ की दहाड़ से पत्थर भी ठरराये होंगे,

ऐसी दरिंदगी देख भगवान भी घबराये होंगे।।



-Prerna