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वो एक पन्ना

पड़ने में उलझी रही हूँ सालों से, और पड़ती रही हूँ कुछ ना कुछ कभी कोई चेहरा कभी कोई क़िताब तो कभी मन को तो कभी खुद को जाने क्यू हर बार कुछ नया ही मिला, कभी सोचा पुराना पड़ा जाएं कुछ क
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