पड़ने में उलझी रही हूँ
सालों से, और
पड़ती रही हूँ
कुछ ना कुछ
कभी कोई चेहरा
कभी कोई क़िताब
तो कभी मन को
तो कभी खुद को
जाने क्यू हर बार
कुछ नया ही मिला,
कभी सोचा
पुराना पड़ा जाएं कुछ
कोशिश की वो पुराना
पन्ना पड़ने की
जो वक़्क्त की किताब में
कहीं गुम गया था
बिन मुड़े पन्नों में
हां शायद मिला
वो एक पन्ना
पर जाने क्यू पड़ कर
लगा वो आज भी
नया हैं, और
छूट गया था पड़ने से।