साँझ का सूरज अभी अस्त नही हुआ,
दूर कहीं क्षितिज मे अपनी दमक से
अगली सुबह का आभास करा रहा है।
दूर कहाँ है सुबह
बस रात की एक छटा बाकी है।
कभी रात की कालिमा मे,
तो कभी दिन के उजाले में,
जैसे मानों खो जाती हो उम्मीद
पर, फिर खिलखिलाती धूप में मुस्कुराती है
वो उम्मीद जो कभी अस्त नही होती।
सूरज का वो ढलना, रात का आना
फिर उम्मीद के दियों का तारों सा टिमटिमाना
सब कुछ तो है अगले सुबह की राह में।
जो अक्सर कहते है कि उनका सूरज ढल रहा है
वो शायद अपने को ही छलते होंगे।
क्योंकि सांझ का सूरज कभी अस्त नही होता
उम्मीद के दीये फिर जल जाते हैं मन के विस्वाश
से।
और हर शक्ति साथ होती है जब सांझ का सूरज ढलता है और उम्मीद के दिये जलते हैं।