जब हाथ लग जाती है
अपनी ही कोई पुरानी डायरी
कितने लम्हों के पन्ने
एक साथ पलटने लगते है
प्रवासी मन
फिर से पहुंच जाता है
टहलने उन यादो के गलियारों में।
कितनी बातें होती है
अपने ही हाल बेहाल की
उस वक़्त की ये बात, वो बात।
कितनी रातें , दिन जो
महीनों और सालो में तब्दील हो गई
सब किसी कहानी सी
मन पटल से होकर गुजरने लगते है।
मैं वक़्त के घड़े से
तेज़ी से रिसते वक़्त को देखती हूँ
सोचती हूँ
ये वक़्त कहाँ जाता है ?
बड़ा खूबसूरत होता है
डायरियों का सफर।
वक़्त से चुरा कर
वक़्त की ही तिज़ोरी में
लम्हें जोड़ना।