यू ही उलझ जाती हैं,बस
एक बात मेरे मन से
जाने कहाँ छोड़ आती हैं, ये बात मेरे मन की।
कोई टोक दे तो कोई रोक दे तो
रफ़्तार के पंख लगा
यू दौड़ पड़ती हैं, ये बात मेरे मन की।।
कभी यू ही बेमतलब से
तो क़भी मतलब के सोच में
छोड़ जाती हैं, ये बात मेरे मन की।।
क़भी कुछ खोने का
तो कभी कुछ पाने का अहसास ले
यू ही आती हैं, ये बात मेरे मन की।।
छोटी सी तो कभी गहरी सी
बस भावनाओं के समंदर में
गोते लगाती, ये बात मेरे मन की।।
कभी बैखोफ ले उड़ती
तो कभी शांत नदियां सी बहती
बस यूं ही सब भूल
बेलगाम चलती, ये बात मेरे मन की।।
-नेहा दुबे