बदलते मौसम की तरह ही खुद को हर रोज़ बदलतें देखा है मैंने अपने मन मे हर मौसम को गुजरते हुये देखा है। कभी बाहर वादियों सी तो कभी पतझड़ के सूखे पत्तों सी निरस बेजान बेरंग भाव लिए तो कभी हरयाली लिए  सावन सी मैंने नई कोपलों को फूटते हुये देखा है । -नेहा दुबे।