माँ।
माँ जो सब की सुनती हैं,
नहीं सुनती तो बस खुद की।
बड़े, छोटे, रिश्तेदार, पारिवार
सब की, बस
अपना कभी कुछ नहीं कहती।
डांटती हैं लाड़ भी दिखाती हैं
माँ जो प्यार से सब लुटाती हैं।
झगड़ कर तो कभी प्यार से
माँ जो छोटी छोटी बातों में
दुनियादारी सिखाती है।
माँ पैरवी नहीं करती,
बस दलीलों में शिकायतें
और चुगलियां सुनती हैं।
माँ निर्णायक न्यायाधीश सी
जब भाई-बहन के, कभी ना
सुलझने वाले झगड़े सुलझाती हैं।
माँ जो सब की सुनती हैं,
नहीं सुनती तो बस खुद की।
कोई फ़रमाइश करते नहीं देखा
पर हाँ, सब की फरमाइशें बिन
कहें ही पूरी करती हैं।
उठाती हैं नाजो नख़रे
माँ जो कभी अपनी नहीं चलाती हैं।
रूठती भी नहीं क़भी किसी बात पर
देखती हैं सब के लिए सपने
नही देखती कोई सपना खुद को।
माँ जो सब की सुनती हैं,
नहीं सुनती तो बस खुद की।
किसी महँगी माँग पर
जोड़े हुए पैसे हाथ में थमा देती हैं,
कितने ही अनगिनत त्याग कर देती हैं,
हँस कर सब सह जाती हैं।
माँ जो सब की सुनती हैं,
नहीं सुनती तो बस खुद की।