सुबह एक आवाज़ का पीछा करते हुऐ मेरी नींद में डूबी आँखे अदरक की खुशबू बिखेरतीं चाय के उबाल मे दिन चढ़ती दुकान से होती हुई वहाँ खड़े कश में बेफ़िक्री का धुंआ उड़ाते उन लोगों पर जा ठहरीं लगा यहीं से वो आवाज़ आई थी औऱ मैं उन की हल्की धूप सी खिलखिलाती लतीफ़ों भरी आवाज़ के बीच उस आवाज़ वाले शख्स को तलाशने लगी, पर नाक़ाम सी रही उनकें जानें पर सिगरेट में फेंकें धुँए के साथ ख़ाली कप जब कूड़ेदान को चिढ़ाने लगें तो फिर से एक आवाज सुनी हाँ वो आवाज़, पहचानी सी आवाज़ जिसका पीछा मेरे कानों ने किया था ये क्या कूड़ेदान की आवाज़ ??? हां ये हरे रंग का डब्बानुमा कूड़ादान स्वच्छ भारत की गुहार लगाता कूड़ादान लगभग चीख़ते चिल्लाते हुए बड़बड़ा रहा था अखबारों की वासी खबरें राजनीती के सड़े-गले मुद्दें सब डालड़ो ना यहाँ हाँ अपनी यहाँ-वहाँ कूड़े फेंकने की गंदी आदत को भी सब समां लूंगा में, पर नेह उस की ये आवाज़ किसी ने नही सुनी लगभग अनसुनी अनदेखी करते लोग जाते रहे और वो कूड़ादान हर जाते शख्स पे चिल्लाता अरे ! अरे भाई, कचरा कुड़ेदान मे तो ड़ालते जाते।
