कौन सुनेगा उन की आवाज़ ??? जो भूखे और बेसहारा हैं, जी रहे अभिशप्त सी जिंदगी, जो सो रहे सड़क किनारें ओड़े आसमान को, झेलते हर थापेड़ मौंसम की, घूरती हुई आँखे दीनता से देख भर, फिर आगे निकल जाती हैं, अनाथ हैं वो बिन घर द्वार के।।। -कौन होगा शामिल उनकी टूटी हुई आस में ??? जो खीचते हुए बोझ अक्सर, रिक्शो पर हार जाती हैं, तो कभी खेतो में काम करते हुए, बारिश की बाट में, ज़मीन में मिट्टी सी सूख जाती हैं, नाउम्मीदी में हैं वो बिन उम्मीद के।।। -कौन भरेगा उजाला उन के जीवन में??? जो रह रहे घुटन भरे बन्द कमरों में, दूर जहाँ से हर रोशनी हैं, जब कारखानों से निकल कालिख़ उनके जीवन में अपना रंग गड़ती होंगी, कैसे वो बेबस होते होंगे उस को छुटाने में, अँधेरे में हैं वो बिन रोशनी के।।। -कौन लड़ेगा उनके हक की लड़ाई??? जिनकी सुनवाई की गुहार, सरकारी दफ़्तर में धूल खाती हैं, तो कभी घोटालो में दम तोड़ती हैं कभी झांकती होंगी वो फाइलें भी, चुनाव का कोई वादा होने को, अन्याय में हैं वो बिन न्याय के।।। -कौन सुनेगा उनकी फ़रियाद ??? जिस के घर कई दिनों से पूरा चूल्हा नहीं सुलगा, बच्चे शाम की आस में राह ताकते हैं, शायद आज खाने को कुछ आधा पेट ही मिल जाये, और माँ जिस ने खाट पकड़ ली हैं बीमारी में, उम्मीद एक ऐसी कि कोई दुआ दावा बन काम कर जाये, बेसहारा हैं वो बिन सहारे के।।।