जिनका बचपन खेला होगा आँगन मे उन्होंने देखा होगा गौरैया को आँगन मे फुदकती हुई, चहकती हुई गौरैया सुबह उसकी ची ची की आवाज़ से अक्सर नींद खुला करती थी मेरी। उसकी ही तरह मेरा दिन भी चहक कर शुरू होता था। पर, अब तो ना गौरैया हैं ना आँगन ना छत की मुँडेर, जिस पर उसका पानी का सकोरा और दाना माँ अक्सर रखा करती थी। और गौरैया को मैंने आखरी बार कब देखा था ठीक से याद तक नहीं। पर बहुत याद आती हैं आँगन मे फुदकती हुए, मुँडेर पर टहलती हुए एक गौरिया, मोरी चिरैया। - नेहा दुबे।.