मिले कभी फुर्सत,तो मिल आना
अपनी सी एक कहानी से,
शायद कुछ मिल जायें,
शायद कुछ जुड़ जाये,
फिर से दरमियान ज़माने के ।
एक शाम गुजारो किसी नज़ारे मे,
बैठ युही ख़ालीपन में,
शायद कुछ दिख जाए,
शायद कुछ बन जाये,
बात युही ज़माने मे।
बैठो थोड़ी देर किसी की बातों मे,
कोई किस्सा बन यादों का,
शायद कुछ पढ़ पाओ,
शायद कुछ लिख पाओ,
अपनी बात जमाने को।
महसूस करो कुछ पल को हवा,
वहीँ जो कुछ सासों में भर गुदगुदाती हैं,
शायद कुछ खिल जाये,
शायद कुछ भर जाये,
अच्छाई एक ज़माने को।
-नेहा दुबे।