कश्मीर रो रहा है, पड़ा मैंने
उस फ़ौजी को भी जो हथेली में
जान लिए फिरता हैं,और सोचा
ये कश्मीर में आख़िर सालो से
यह क्या हो रहा हैं ?
दोष इस बार भी सरहदों के हिस्से ही आया।
सरहदें जिन्हें इंसानो ने ही बनाया,
पहरा फिर दोनों ओर बिठाया,
देश के बीच की सरहदें तो वर्षों से
वैसी ही खड़ी हैं, पर
दिलो की सरहदें बहुत बढ़ गई हैं।
हजारों वॉट के दौड़ते करेंट के बीच
कैसी कसमकस में रहती होगी ना
ये सरहदें??
जब भी वहाँ हलचल होती होगी
तो इंसानियत को जार जार हो
मूक ही रोती होंगी ये सरहदें।
कुछ दिया नहीं हैं खूनखराबे, लाशों,
और नफरतों के सिवा,
पर जाने क्यू? हिफ़ाजत को
लाखों हँस कर बली चढ़ गए ।
काश ! ये सरहदें भी कालचक्र में होती
जन्म लेती, ज़बान भी होती और
फिर बूढ़ी हो कर मर जाती, पर
बदनसीबी इन की ये एक कल्पना मेरी,
हजारों युद्ध झेल कर भी जिंदा खड़ी हैं।
बहुत बारूद हैं ना??
और मारने का शौक़ भी,
बहुत बारूद हैं ना ,
और मरने मारने का शौक़ भी,
तो क्यू ना,
चला दो सारी गोलियां,
उड़ा दो बारूद से,
मिटा दो सरहदों को,
सरहदें जो देशो की हैं,
सरहदें जो दिलों की हैं।