छन्नी हुए आज फिर कई तन,
ज़मीन के एक टुकड़े को,
छिड़ा फिर एक ख़ूनी मंज़र
उरी(Uri) की वादियों मे ।
जबान की टपकती हुई हर रक्त की बूंद,
फिर एक सवाल करती है
सवाल ही सवाल में
फिर एक जबाब ढूंढती हैं।
क्या ?
यूँही बहती रहूंगी ताउम्र बेगुनाह सी।
सुर्ख़ होतीं वो लाल आँखे,
जाते जाते भी वतन परस्त निकली,
बंद होते भी नजरें फ़क्र से तिरंगे ओर निकली।