-बंटबारे की आँधी मैंने हर मौसम चलते देखी हैं, राजनीति की भट्टी में सब सिकते देखा हैं। -कैसे रिश्ते रिश्तों से टकराते, कैसे कोई अपना हाथ छुड़ाता, वोटों की आँधी में मैंने सब उड़ते देखा हैं। -कैसे बरगद, पीपल से पेड़, जमी जड़ें जिनकी वर्षों से, आज उन्हीं को धराशाही होते देखा हैं राजनीति की तेज़ हवा में मैंने सबको गिरते देखा हैं। -कैसी उपजाऊ जमी, जहाँ राजनीति की खेती उगती थीं, आज उसी फसल को खरपतवार सा उखाड़ते देखा हैं, राजनीति की छटनी में मैंने सब को उखड़ते देखा हैं।