क्या है ये आवाजे वो जो सुनाई देती हैं, या वो भी जो सुनाई नही देती, कुछ धीमी,कुछ तेज़, गाड़ियों की, लोगों की औऱ भी न जाने कौन कौन सी आवाजें, कितनी आवाजे जो दिन रात गूँजती हैं, करती हैं सफर दिन से रात, रात से दिन का बिन रुके बिन थमे। दिन औऱ रात की आवाजें अलग अलग है, कुछ जो दिन को ही सुनाई देती हैं, और रात को सोने चली जाती हैं। और कुछ जो दिन रात जागती रहती हैं बिना रुके । अभी भी कुछ आवाजें जो जाग रही हैं जैसे-जैसे घड़ी के कांटे रात की ओर सरक रहे हैं, धीरे-धीरे कर कुछ आवाजें जो दिन की थी धीमी हो रही हैं, अब तो बस एक दो गाड़ियों की कुछ देर ठहर कर आती आवाजें है जो मुझे सुनाई पड़ रही हैं, कुछ औऱ भी आवाजें हैं जो मेरे इस कमरे मे सुनाई दे रही हैं, टिक टिक करती पास ही टेबल पर रखी अलार्म घड़ी, घन घन करते पंखे के अलावा यहाँ एक और आवाज है जो बाकी सुनी हुई आवाजो से अलग है, हर सुनी हुई आवाज को पहचानती हूँ, पर इस आवाज से अंजान हूं, ये आवाज हैं ख़ामोशी की आवाज़ । हाँ, ख़ामोशी की आवाज, कोई अल्फाज नही है इसके ना कोई आवाज, ऊपर से शांत होते हुए भी भीतर ही भीतर कितनी आवाजे हैं इसकी क्या ये धड़कनो की आवाज़ है या मन मे चलते ख्यालो की या कुछ और जिन से मैं खुद भी अंजान हूं। पर ये जो खामोशी की आवाज़ है, शाम को सुनसान सड़क से आती साय साय करते झीगुरों की आवाजो से, अंधेरे के सन्नाटे को चीर कर आती सियारो की हुआँ हुआँ की आवाजों से, दूर से भौकते कुत्तों की भौ भौ से, भी कहीं ज्यादा डरावनी होती हैं। सुना है कि खामोशी की इन आवाज को हमे सुनना चाहिए, मैं भी सुन रही हूं, खामोशी की आवाजो को कोई भी आवाज साफ नहीं हैं, कुछ आवाजो का पीछा करते बड़ी दूर निकल जाती हूँ, औऱ फिर वो आवाजें अंधेरे में कहीं गुम जाती हैं, और मैं भी... ऐसा कुछ वक़्त तक चलता है, औऱ फिर कोई आवाज़ मुझे उजाले की दहलीज पर छोड़ जाती हैं, बस मैं इस रात के मंजर में यू ही आवाजो के बीच खेल रही हूं। ये आवाजें कैसी है जिन्हें मैं सुन रही हूं नही पता ये आवाजे ही है, या शोर है, खामोशी है, या सन्नाटा क्या है ये?? ये तो जेहनी मिज़ाज़ ही तय करेगा मेरा किसे क्या बनाना है, पर ये आवाजे कभी बंद नही होंगी और ना ही ख़त्म होंगी, ये आती रहेंगी, बस कभी धीमी हो जायंगी, तो कभी तेज़ आवाज में चीखेंगी चिल्लाएगी, कभी बाहर से आती आवाजो में, तो कभी अंदर से आती जेहनी आवाजो में।