कभी लड़ती सम्मान को
तो कभी खुद से त्यागती
अपने होने का अहसास करती ये औरतें
कभी ठुकराई गई तो कभी अपनाई गई
ठुकराए जाने पर फिर से अपनाये जाने
की उम्मीद में जीती ये औरतें।
बचपन से सिखाये जाते सब क़ायदे
बस उनके लिए ही बनाएं जाते सब दायरे
घूघट मे घुटती संस्कारो की
खोखली ओढ़नी ओढे ये औरते
हँस कर ग़म छुपाती
सम्मान बचाने को अपमान झेलती ये औरते
रिश्तों की हर दहलीज़ पार करती
आगे बढ़ती ये औरतें
त्याग की परिभाषा लिए
अपने लिए नही दूसरों के लिए जीती ये औरतें
-नेहा दुबे