अच्छा होता की हम बच्चे होते
समझदार नहीं नासमझ होते
छोटे से हाथ होते पर हिम्मत
आसमान को छुने की होती ।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
पास ना कोई खजाना होता,पर
गुल्लक में DADDY से ज़िद कर
जोड़े गऐ पैसो से, पुरी दुनियाँ
खरीद लेने का जज्बा होता।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
रूठने का भी एक अलग अंदाज होता
दोस्ती भी बस छोटी उंगलियों
के मिलने भर से होती ।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
कई बार गिरते पर उठ कर
बस शान से, जीते ठोकरो
से सम्भलकर चलना सीख लेते ।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
मिट्टी के घरौंदे ही कभी
सच के घर बन जाते, जहाँ
हम बस खुशियाँ ही रखते
फिकृ को तो जैसे No Entry
का Board दिखाते ।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
करते कई मनमानियाँ तो, कभी
करते ज़िद चाँद को छुने की
तो सच में छू भी लेते उसे
फर्स पर बने बिम्ब में और
उस ज़ीत में फकृ से मुस्कुराते ।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
मुठ्ठी में हौशले ले घूमते
रात को सोते तो किसी चीज़
की परवाह ना होती ,ना कल की
ना आज की, हर लम्हें को जीते
हर पल में खुश रहते और
हर हाल में में मुस्कुराते ।
अच्छा होता की हम बच्चे होते ।
- नेहा दुबे ।