किसी सर्द सी शाम को

ले कर बैठे दुनिया जहान की बातें

और देर तक एहसासों का तानाबाना बुनें


या फिर कॉफी की भाप से

धुंधलाते चेहरे की बेमतलब मुस्कानों में

शब्दों के परे सिमटा हुआ सब अनकहा सुनें


अच्छा सब छोड़ो यूहीं यहीं

ऑफिस के पचड़े, कागज़ों के टुकड़े

चलो मिलकर तुम्हारे लिए कुछ बेफिक्र लम्हें चुनें


क्यूंकि...


जिन्दगी के फिक्स्ड, ये ही इने-गिने पल हैं

एवरेज ही इनका, स्टैटिस्टिकल हल है

कोई तजवीज़ मुकम्मल नहीं है यहाँ

आज ही आज, जो है अभी के अभी है

कल का क्या पता? कि कल तो कल है



-नेहा