जाने किस उलझन में है मन
कभी इधर भागता है कभी उधर
घने बेर की ठंडी छाँव अच्छी लगे
तो कभी रुपहली सी दोपहर
किस धूप-छाँव में है मन
कभी इधर भागता है कभी उधर
कभी निन्दा करे उसकी लगातार
कभी प्रशंसा करे जी भर कर
कैसा भला, कैसा बुरा है मन
कभी इधर भागता है कभी उधर
कभी पहले सावन में खूब भीगता है
कभी अलाव तापता है रातभर
कैसा भीगता-सूखता है मन
कभी इधर भागता है कभी उधर
कभी मिलन की चाह में मिट जाता है
कभी है संतुष्ट अंतहीन विरह स्वीकार कर
किस मिलन-जुदाई में है मन
कभी इधर भागता है कभी उधर