सोन मछरिया ये क्या तरल है जो  मेरे फेफड़ों के अंदर-बाहर बना हरकारा है तुम्हारी चाह की साँसे हैं फेफड़ो में धधकती दुबारा तिबारा चौबारा है     तालाब में भी कुछ न कुछ जल खारा है तालाब में मिश्रित खारापन मेरे आसुंओं की जलधारा है     तुम्हारा मिलना है जैसे सोन मछरिया से समन्दर की धारा है कभी नहीं मिलते जो जिनका न मिलना ही जीवन सारा है     क्या देगा मुझको वो जो खुद ही अंबर का टूटा तारा है अंबर छूटा, मैं भी छूटी
  • छूटते जाना ही भाग्य हमारा है।
*****