श्मशान   मैं खड़ी थी वहाँ जहाँ श्मशान था कुछ नहीं था बस वहाँ राख का मैदान था   कुछ चिताएं जल रही थीं और कुछ अब ख़ाक थीं वृक्ष पूरा जल चुका था बस बची अब राख थी धरती का सीना फट चुका था पाया जो ऐसा दान था कुछ नहीं था बस वहाँ राख का मैदान था   चार कांधों के सहारे आ रहे थे वो दीवाने छोड़ चले थे संसार जो तैयार थे परलोक जाने चार कांधों के सहारे चल दिया मेहमान था कुछ नहीं था बस वहाँ राख का मैदान था    क्या ये पाई मौत है कि चंदन हो या लकड़ियां कुछ भी तो अंतर है नहीं ख़तम है जब कहानियाँ औकात थी बराबर, कंगाल या धनवान था कुछ नहीं था बस वहाँ राख का मैदान था   हर एक आँसू बह चुका था अब तो है बस इंतज़ार क्योंकि अब अपनी है बारी मंज़िल है, तो है उस पार सृष्टि का यह नियम सदा से विद्यमान था कुछ नहीं था बस वहाँ राख का मैदान था   हर एक शव को मिली तिलांजलि और अग्नि दी गई तज दिया शरीर यह और काया पाई नई एक जीवन, एक सफर और खत्म एक इम्तहान था कुछ नहीं था बस वहाँ राख का मैदान था   *****