शिकायतों का दफ़्तर जाने आज क्या मुझे सूझी है शिकायतों का दफ़्तर खोले बैठी हूँ हर किसी से मुझे शिकायत है सब पर मुकदमा दायर करने बैठी हूँ समाज के नाम पे इंसान के नाम पे और एक फाइल तो भगवान के नाम पे फाइलें इतनी हैं कि क्या बताऊँ नालिश कर दूँ जो भगवान को पा जाऊँ I मैनें तो कभी खुशियाँ माँगी नहीं देनेवाले ने जो दे दीं सो दे दीं फिर क्या हक़ है जो वापस छीन लेता है तू आख़िर देता है तो क्यूँ देता है दे देने के बाद वो चीज़ तेरी नहीं और ऐसे कोई किसी की चीज़ लेता है कहीं जीवन मैंने माँगा नहीं फिर तेरे कहने से क्यूँ मरूँ बता भला अब तुझपर नालिश न करूँ तो क्या करूँ II आ जाओ सामने समाज के ठेकेदारों आओ आज कटघरे में तुम भी पधारो एक गलती की सज़ा दी जाती नहीं दुबारा फिर इंसान को समाज के नाम पे क्यूँ मारा क्यूँ मुझे समाज की जेल में कैद किया क्यों इंसान को अवैध रूप से बंधक बना लिया इंसान होने की सज़ा साँस रहते बार-बार देते हो हर बार जीने की कोशिश करती हूँ पर तुम मार देते हो   III इंसान तू भी तो किसी से कम नहीं हिंसक से हिंसक जानवर में भी दम नहीं कि तेरे वहशीपन का मुकाबला कर सके लूटता है दूसरों को कि अपना पेट भर सके ढोर भी छोड़ देते हैं ज़मीन की दूसरा चर सके हाल करता है वो कि न जी सके न मर सके खुद को किस मुँह से इंसान कहूँ क्यूँ न खुद को इस बिरादरी से निकाल दूँ   जाने आज क्या मुझे सूझी है शिकायतों का दफ़्तर खोले बैठी हूँ हर किसी से मुझे शिकायत है सब पर मुकदामा दायर करने बैठी हूँ *****