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लौहपथगामिनी

वह चलती साँप सी सारा रास्ता नापती रेंगती बलखाती हुई हर मंजिल पीछे छोड़ जाती हुई हवाओं में छोड़ा धुआँ छुक-छुक सा फिर स्वर हुआ   वह चलती सरिता समान शहर, गाँव या हो सुनसान सब जगह से गुज़र
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