वह चलती साँप सी सारा रास्ता नापती रेंगती बलखाती हुई हर मंजिल पीछे छोड़ जाती हुई हवाओं में छोड़ा धुआँ छुक-छुक सा फिर स्वर हुआ   वह चलती सरिता समान शहर, गाँव या हो सुनसान सब जगह से गुज़र जाती ढलती उसकी उमर जाती चलती कुछ-कुछ रेंग कर चलती नदी के वेग पर   चल रही पवन सरीखी इसी से तो चाल सीखी खेत, नहर, गाँव, टीला ऊपर है आकाश नीला नीचे है लोहे की खेती राही को वह राह देती