दो नयनों की बाती में आशा के रेशे जला बैठी हूँ मोम पिघल के आँसू बने मैं तुमसे प्रीत लगा बैठी हूँ   रोम-रोम पुलकित हो उठे थर-थर-थर काँप जाती हूँ स्वर तुम्हारे जब सुन पड़े मैं निरर्थक ही लजाती हूँ   तुम्हें पाने की चेष्टा में क्यों न कहाऊँ पथ-भ्रष्टा पीछे न हटूँगी, ओ मेरे हृदय में प्रेम के सृष्टा **********   देखो मेरा यह ढीठ मन करे तुम्हारा ही चयन क्यों मेरा यह प्रेम नमन करें तिरस्कृत तुम्हारे नयन   है मेरा यह हृदय जर्जर सर्वस्व ही अर्पित तुम पर इतने पर भी तुम्हें अगर नहीं सूझता प्रेम-प्रखर   तो मैं चुप न रहूँगी मुझे न समझना गूँगी यशोधरा-उर्मिला नहीं बनूँगी मैं कोई और ढूँढ लूँगी