प्रभु मेरे एक दर्शन वांछनीय है लख कर प्रभु का सौंदर्य मेरे नयन तृप्त हो जाऐंगे मेरी श्रद्धा अगर दो बूंद अश्रु बन गई हो तो दर्शन दो या अश्रु मेरे धूल में मिल खो जाऐंगें अंजलि में अपनी भर, श्रद्धा तुम्हें अर्पित करुँ माटी की इस देह में, आत्मा को मैं दीप्त करूँ तुम से तो बस इतना ही मेरा निवेदन है कि आत्मा के कंठ में प्रभु की प्यास से जलन है दर्शन से कर दो इस पिपासा को तृप्त हो ना जाऊँ कहीं इस प्यास से विक्षिप्त मौन हो तो कोई बात नहीं स्वर की अमृतधारा मुझे न चाहिए बस नाम आपका मेरे अधरों पर रहे और आप हृदय में उतर जाइए मुझे बस अपने दर्शनों से अनुग्रहीत करें तुच्छ इस आत्मा को क्षितिज में विलीन कर दें यह आत्मा मिल जाए परमात्मा में मुझे बस इतना सा वर दें