मिट्टी का लोंदा हूँ, मैं पत्थर समान हूँ मैं निस्पंद सा एक मक़ान हूँ भावनाओं का मुझपर असर नहीं मक़ान हूँ! मक़ान! किसी का घर नहीं मुझ पर गिरें आँसुओं की धाराएं मुझ पत्थर पर गिर के खो जाएं कुछ सीखती नहीं, कुछ जानती नहीं मिट्टी का लोंदा हूँ, पर मानती नहीं ज्ञानशून्य, भावशून्य, लज्जा रहित मैं जड़ हूँ, मैं दूषित हूँ, मैं पतित हे राम! चरण न तो न सही फिर चरण की धूलि लगाओ वही जिससे फिर से अहिल्या बन जाऊँ मोक्ष दो ऐसा कि दुबारा स्त्री-जन्म न पाऊँ