उस दिन मैंने कविता अनुपम रची थी जिसके लिए ठकुराइन ही एक श्रोता बची थीं लेकिन ठकुराइन भी घर में नहीं थी मैं कविता सुनाने को उत्सुक हो रही थी मैंने सोचा चलो सामने के हलवाई को सुनाएं मैंने कहा "लड्डू जी ज़रा इधर तो आएं" मुझे देखते ही लड्डू जी दुकान छोड़ भाग गए मुझे आता देख गली के सारे कुत्ते जाग गए हर घर के आगे सुन रही थी गुर्राहट घूम रही थी लिए कविता सुनाने की चाहत   मैं पहुची गुप्ताइन को कविता सुनाने लेकिन वे लगीं मेरे पाँव दबाने ताकि वे मेरी कविता से बच सकें और भागने का कोई प्लान रच सकें बोलीमैं तुम्हारे लिए समोसे बनाती हूँ मैंने कहानहीं पहले मैं कविता सुनाती हूँ वे न मानी पिंड छुड़ाकर चली गईं बहुत देर जब वे गायब रहीं मैंने जाकर देखा, रसोईघर एकदम धुला और देखा पिछवाड़े का द्वार खुला न समोसा था कहीं न उसकी गंध मैंने भी कर दी अपनी डायरी बंद   मैं इस चूहे-बिल्ली के खेल से थककर अपनी कविता लेकर पँहुची अपने घर मुखमंडल से मैं उदासी टपका रही थी   सामने देखा तो गुप्ताइन आ रही थी बोलीतुम्हारे लिए श्रोता लाई हूँ मैंने कहाआज मुझ पर इतनी मेहरबानी क्यूँ कुछ बोली नहीं, मुस्कुराकर एक युवती बिठा गईं मैंने उसे सुनाई अपनी कविता नई चूहे-बिल्ली के इस खेल से थक गई थी इसीलिए यह कविता एक बहरी को सुना रही थी।   *****