
उस दिन मैंने कविता अनुपम रची थी
जिसके लिए ठकुराइन ही एक श्रोता बची थीं
लेकिन ठकुराइन भी घर में नहीं थी
मैं कविता सुनाने को उत्सुक हो रही थी
मैंने सोचा चलो सामने के हलवाई को सुनाएं
मैंने कहा "लड्डू जी ज़रा इधर तो आएं"
मुझे देखते ही लड्डू जी दुकान छोड़ भाग गए
मुझे आता देख गली के सारे कुत्ते जाग गए
हर घर के आगे सुन रही थी गुर्राहट
घूम रही थी लिए कविता सुनाने की चाहत
मैं पहुची गुप्ताइन को कविता सुनाने
लेकिन वे लगीं मेरे पाँव दबाने
ताकि वे मेरी कविता से बच सकें
और भागने का कोई प्लान रच सकें
बोली “मैं तुम्हारे लिए समोसे बनाती हूँ”
मैंने कहा “नहीं पहले मैं कविता सुनाती हूँ”
वे न मानी पिंड छुड़ाकर चली गईं
बहुत देर जब
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