हवा भी छुए तो सिहर जाते हैं। चोट ऐसी कि दर्द से मर जाते हैं।   इन्हें पट्टी से बांधू तो सड़ जाते हैं। इनसे पट्टी खोलूँ तो बढ़ जाते हैं।   खुली हो चोट तो ठेस लग ही जाती है। रिसता हो ख़ून तो मक्खियां भिनभिनाती हैं।   बंद हो चोट तो कुछ ख़बर नहीं होती। फैलती है चोट, ठीक मगर नहीं होती। आप तो आप हैं, दवा में ज़हर दे जाते हैं। हम जो दर्द से मरते थे, ज़हर से मर जाते हैं।   ****