किसी तूफ़ान की सूचना न थी आकाश में न था बादल कोई मुहूर्त भी शुभ बताया गया न थी नदी में हलचल कोई   हर काम तेज़ी से चल रहा था घर का माहौल बदल रहा था हर एक प्राचीर सज रही थी ब्याह की शहनाई बज रही थी घर में लोग अटे पड़े थे उन में सब काम बंटे पड़े थे हर एक था अपने काम में व्यस्त घरातियों की तैयारी थी जबरदस्त दूर होने लगी चिंता बड़ों की हर चेहरे पर छाई खुशी   माता-पिता की आँखें भीगी हल्की खुश होते कर कल्पना कल की आँखों में पल-पल सपना संजोया काटेगा कोई आज जो हमने बोया रह जाते वह यह सोचकर जाएगी अब बेटी पराए घर बेटी तो है पराया धन फिर क्यों हो दुखी मन पिता ने माथा चूम-चूम लिया माँ ने चाव से शृंगार किया           भइया को जरा भी फुरसत नहीं स्वागत में रहे न कोई कमी कुछ दुर्भाग्य बन रहा आकाश में वह बैठी थी दुल्हन के लिबास में भाई ने भी देखा एक नज़र चली जाएगी वह पराए घर आँसू थामें एक पल रूका फिर वह नीचे झुका वहाँ से काम की सूची उठाई खत्म़ होते काम पर नज़र दौड़ाई               आँखों में आँसू का समंदर था उस गली में एक घर था अक्सर देखा करती थी छत से कभी मिला करती थी ख़त से वह आया नही आज शादी में आता भी कैसे, अपनी बरबादी में एक ही नदी बही थी दोंनो के नयनों तीरे रात हाथ से फिसल रही थी धीरे-धीरे कई अरम़ान दफ़न हो रहे थे उन आँखों से जब आँसू बहे थे   किसी तूफान की सूचना न थी आकाश में न था बादल कोई मुहूर्त भी शुभ बताया गया न थी नदी में हलचल कोई